
- विधायक उमेश पटेल के मार्गदर्शन में मदनपुर से तहसील तक गूंजी हुंकार; एसडीएम की गैर-मौजूदगी में तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन
खरसिया। जब प्यासी फसलें और सूखते हलक सड़क पर उतर आएं, तो प्रशासन की चुप्पी खतरनाक हो जाती है। सोमवार को खरसिया में कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। विधायक उमेश पटेल के मार्गदर्शन और निर्देश पर मदनपुर कांग्रेस कार्यालय से जन-आक्रोश की एक लहर निकली, जिसमें करीब 250 कांग्रेस कार्यकर्ता और क्षेत्र के किसान पैदल मार्च करते हुए तहसील कार्यालय जा धमके। मुद्दा था— दम तोड़ती रबी की फसलें और पाताल में जाता वाटर लेवल।
बंद गेट पर हुई नोकझोंक
तहसील कार्यालय पहुँचते ही पुलिसिया पहरे और बंद गेट ने प्रदर्शनकारियों के गुस्से में घी डालने का काम किया। चिलचिलाती धूप में गेट के बाहर ही ‘हल्ला बोल’ शुरू हो गया। ‘नहरों में पानी छोड़ना होगा, तानाशाही नहीं चलेगी’ जैसे नारों से पूरा परिसर दहल उठा। कांग्रेसियों और किसानों का गुस्सा देख आखिरकार पुलिस को पीछे हटना पड़ा और गेट खोला गया।
एसडीएम की अनुपस्थिति पर उठे सवाल
हैरानी की बात रही कि इतने बड़े प्रदर्शन के दौरान एसडीएम मौके पर मौजूद नहीं थे। उनकी गैर-मौजूदगी में तहसीलदार मोनल साय को ज्ञापन सौंपा गया। कांग्रेसियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं है, बल्कि 7 दिन का ‘फाइनल अल्टीमेटम’ है। अगर एक हफ्ते के भीतर कोरबा नहर और आंडपथरा डैम का पानी किसानों के खेतों तक नहीं पहुँचा, तो खरसिया की सड़कों पर एक बड़ा ‘जन-आंदोलन’ खड़ा होगा। ज्ञात हो कि आज ज्ञापन सौंपने की बात कांग्रेस की ओर से पहले मीडिया के जरिए जारी कर दी थी उसके बावजूद एसडीएम का मौके पर ना होना कई सवाल खड़ा कर रहा है।
क्या है जमीनी हकीकत?
क्षेत्रीय विधायक उमेश पटेल की दूरदर्शिता इस आंदोलन के पीछे साफ नजर आई। खरसिया के तालाब, कुएं और बोरवेल अब जवाब दे रहे हैं। रबी की फसलों को बचाने के लिए नहर का पानी ही आखिरी उम्मीद है। मौके पर उपस्थित कांग्रेसियों ने चेतावनी दी है कि प्रशासन किसानों के सब्र का इम्तिहान न ले। मौके पर एसडीओपी और थाना प्रभारी भारी पुलिस बल के साथ तैनात रहे, लेकिन किसानों की आंखों में साफ था कि वे अब वादों से नहीं, पानी की धार से मानेंगे।

