रायगढ़: जमीन मुआवजा की प्रतीक्षा में पथरा गई आँखे, ग्राम खिचरी के ग्रामीणों की व्यथा सुने कौन..?

हाईलाइट्स

  • प्रशासन द्वारा लिखित में आश्वासन देने के बाद भी आज तक नहीं मिला मुआवजा
  • फाइलों में दौड़ रहा प्रकरण ऑफिस दर ऑफिस
  • अपने जमीन को खोदकर फिर से खेत में मिलाने की कर रहे बात
  • प्रशासन ने किसानों को तीन महीने में मुआवजा दिलाने का लिखित आश्वासन देकर आमरण अमशन करने से किसानों को मना किया था

रायगढ़ 17 मई। रायगढ़ जिला के बरमकेला विकास खंड अंतर्गत बन रहे बरमकेला से सोहिला (ओडिशा) राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित जमीन का मुआवजा किसानों को भुगतान करने में अधिकारियों की उदासीनता, ठेकेदार की मनमानी और शासन की उपेक्षा से किसान इस हद तक दुखी है कि पहले तो उन्होंने निर्माण कार्य पर रोक लगाई फिर आमरण अनशन की चेतावनी दी और अब व्यथित होकर अपनी जमीन को फिर से खोदकर खेत में मिला लेने की मानसिकता बनाने के लिए विवश होने की बात कहने लगे है।
समय दर समय देते हुए एक साल बीत गया पर अधिकारियों की औपचारिकता पूरी नही हो पाई कभी विधानसभा तो कभी पंचायत चुनाव का आचार संहिता, कभी और कोई कारण तो कभी लाकडाउन का कारण बताकर दस्तावेजी प्रक्रिया लालफीताशाही में कैद होकर एक आफिस से दूसरे आफिस में घूम रही है लेकिन दो साल पहले राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित किसानों की जमीन का मुआवजा प्रकरण आज तक पूरा नहीं हो पाया है।

▪️ तहसीलदार ने किसानों को तीन महीने में मुआवजा दिलाने का लिखित आश्वासन देकर आमरण अमशन रुकवाया था –

                      

                       पुराने अखबार की कटिंग

किसान अपने हक की लड़ाई के लिए तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और मुख्यमंत्री के जनदर्शन तक आवेदन देकर फरियाद कर चुके है इस बीच व्यथित किसानों ने अगस्त 2019 में कलेक्टर को आवेदन देकर आमरण अनशन की चेतावनी दी तब राजस्व विभाग के तहसीलदार व स्थानीय पटवारी ग्राम खिचरी जाकर किसानों को तीन महीने में मुआवजा दिलाने का लिखित आश्वासन देकर आमरण अमशन करने से किसानों को मना किये थे। तीन माह बीत गए किसान एक माह और भी इंतजार करने के बाद दिसंबर 2019 में अधिकारियों से संपर्क किये तो एक दो सप्ताह में भुगतान हो जाने की बात कहीं एक दो हप्ता में मुआवजा मिलने के आस भी जगी क्योकि किसानों का बैंक में खाता भी खुलवा लिया गया लेकिन किसानों की उच्च स्तर पर फाईल जनवरी से लेकर मई महीना तक पड़ी धूल खा रही है और प्रशासनिक अधिकारियों को लॉकडाउन का बहाना मिल गया। अपने स्वामित्व की जमीन का मुआवजा पाने के लिए राजस्व विभाग, लोकनिर्माण विभाग से लेकर सड़क निर्माण विभाग और ठेकेदारों के बुने हुए जाल तथा शासन प्रशासन की उपेक्षा में बड़ी तरह फँसे किसानों की व्यथा इस हद तक बढ़ गई है कि अब वे अपने अधिग्रहित जमीन को पुनः खेत मे मिला देने जैसे दुःखद निर्णय लेने की सोच तक आ गए है। किसानों के हितों की बड़ी – बड़ी बात करने वाले सत्ता के शिखर पर बैठे हुए जनप्रतिनिधियों को ग्राम खिचरी के किसानों की व्यथा कब सुनाई देगी इसकी चिंता गांव वालों को सता रही है वही इस रास्ते से गुजरने वाले हजारों लोग शासन-प्रशासन को कोसते हुए अधूरे और उबड़ खाबड़ सड़क को पार करते है।

▪️ग्रामीणों ने ठाना ने है जब तक मुआवजा नही तब तक निर्माण नहीं

बरमकेला से सोहिला राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण कार्य ग्राम खिचरी से कनकीडीपा तक लगभग एक किलोमीटर तक अधूरा पड़ा है जिससे राहगीरों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है । ग्राम खिचरी के किसान राधेश्याम पटेल, चिंतामणि पटेल, टेकलाल, रामदयाल सिदार सहित महिलाओं का भी एक स्वर से कहना है बार-बार ठगे जाने से अब हम ठान लिए है कि जब तक मुआवजा का भुगतान नहीं हो जाएगा वे निर्माण कार्य नहीं होने देंगे बल्कि अब तो रोड के लिए जबरन कब्जा कर हमारे अधिग्रहित जमीन को खेतों में मिलाने पर विचार कर रहे है जिसके लिए पूरी तरह शासन प्रशासन के लोग ही जिम्मेदार होंगे।