मौत का वो खौफ़नाक मंजर, चारों तरफ बिखरे थे जवानों के शव, खून से सनी धरती देखकर बचाव दल की भी भर आई आंखें… नक्सलियों ने इस तरह अपने जाल में फांसा था शहीदों को..! जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी..!

बीजापुर। घने जंगल, दुर्गम इलाका, चारों तरफ जवानों के बिखरे हुए शव। शाम की हवाओं में लाशों से निकली फैली हुई दुर्गन्ध। आसमान भी जवानों के खून से रंगकर लाल नजर आने लगा था। शहीदी के रंग में रंगे वो पत्ते उड़ उड़कर मानों वीर पुत्रों की बहादुरी की गाथाएं कह रहे हों।

किसी जवान की लाश पर कपड़े नहीं, तो किसी के जूते गायब। तीतर-बितर होकर पड़े शव। जिन्हें पहचान पाना भी मुश्किल है कि कौन किस मां का बेटा है। यहां पर कोई धर्म, जाति और मजहब नहीं, सबके खून का रंग एक ही -सिर्फ लाल।

नृशंसता की हद हो गई

जिधर देखो , उधर शव ही शव नजर आ रहे थे। जमे हुए खून से पूरी धरती लाल हो चुकी थी। कई चेहरे इतनी बुरी तरह से कुचले गए कि नृशंसता की हद हो गई। इतनी क्रूरता, इतनी नफरत, आखिर क्यों और किसलिए? एक मां, एक बीवी बिलख बिलख कर रो रही है। आखिर क्यों किसी के रोने पर कोई हंस रहा है। ये कैसा दौर आ गया है जब इंसान ही इंसानों को डस रहा है। छत्तीसगढ़ का वो दुर्गम इलाका, जहां परिंदा भी आसानी से पर नहीं मार सकता। वहां का यह खौफनाक मंजर… कई नदी नालों के पार जिला मुख्यालय सुकमा से करीब 100 किलोमीटर अंदर बसा है गांव टेकलगुड़ा। यह गांव नक्सलियों का अड्डा माना जाता है। यहां पहले कभी कोई फोर्स आज तक जा नहीं पाई। इसी गांव के आस पास रहता है नक्सलियों का कमांडर हिड़मा। जिसकी तलाश में ही हमारे पुलिस के जवान निकले हुए थे।

यह जगह नक्सलियों के लिए काफी सेफ कही जाती है, क्योंकि इलाका पहाड़ों से अटा हुआ है । ऐसे में यहां पर नक्सली आसानी से छिपकर सुरक्षा बलों के जवानों पर हमला कर देते हैं। यही वजह है कि आज तक पुलिस फोर्स इस जंगल में कदम नहीं रख पाई।

नक्सली हिड़मा का खात्मा था मकसद

लेकिन इस बार जवानों ने भी ठान ली थी कि वे नक्सल कमांडर हिड़मा को पकड़ कर ही दम लेंगे। हिड़मा की तलाश में शुक्रवार रात ही STF, CRPF, DRG और कोबरा के जवान अलग-अलग टुकड़ियों में निकले थे। जो धीरे-धीरे करके जंगल के रास्ते पर बढ़ने लगे। काफी दूर निकलने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि रास्ता बेहद पेचीदा है, जहां से निकलना मुश्किल है। जवानों की वापसी के दौरान यह पूरा हादसा हुआ।

सुकमा से 50 किलोमीटर आगे दोरनापाल से वेस्ट की दिशा में एक सड़क जगरगुंडा होते हुए बीजापुर के बासागुड़ा तक जाती है। इसी रास्ते पर हमारे जवान थे। लेकिन जगरगुंडा और तरीन के बीच का रास्ता 4 दशकों से बंद पड़ा है। जिसकी जानकारी जवानों को नहीं थी। ऐसे में इसी रास्ते पर सुरक्षा बल के जवानों को नक्सलियों ने फंसा लिया और वे वहां से बाहर ही नहीं निकल पाए। इसी रास्ते को तर्रेम के नाम से जाना जाता है। जहां नक्सलियों ने पहले से ही पूरी प्लानिंग कर रखी थी। जवानों को गुमराह कर उन्हें अपने जाल में फंसाया और उसके बाद एक-एककर दनादन गोलियां बरसा दी। इस ताबड़तोड़ फायरिंग की शुरुआत गांव से चली गोली से हुई।

गांववालों का वेष धरकर चली घिनौनी चाल

आमतौर पर फायरिंग की वारदात इन जंगल या पहाड़ों के पीछे से की जाती है, लेकिन इस बार नक्सलियों ने जंगल से नहीं, बल्कि गांव से ग्रामीण का भेष धरकर गोली चलाई। जिसको जवानों ने समझने में देरी कर दी।जवान इससे पहले समझ पाते कि नक्सलियों की योजना क्या है, उससे पहले ही वे उनके जाल में फंस गए। जवान आमतौर पर गांव पर आसानी से गोली नहीं बरसाते, इसलिए वे असमंजस में ही रहे।  इसी बीच पहाड़ से दनादन गोली बरसने लगी।  जब तक कि खुद को संभाल पाते, तब तक नक्सली पूरी तरह से उन पर हावी हो गए। 

जवान एक तरफ से जबकि नक्सली तीनों ओर से गोलियां दाग रहे थे। मुश्किल हालात में भी जवानों ने 6 घंटे तक मोर्चा संभाले रखा। नक्सलियों ने नजदीक के एक दूसरे गांव जिला गांव कोठी को भी खाली कर रखा था। ऐसे में जवानों के पास कहीं जाने का मौका नहीं था। बताया जा रहा है कि मौके पर ढाई सौ से ज्यादा नक्सली मौजूद थे। ऐसे में एंबुश में फंसने के बाद जवानों में विपरीत परिस्थिति में भी जमकर नक्सलियों का मुकाबला किया।

रची थी जवानों को फंसाने की साजिश

सूत्रों की मानें तो नक्सलियों ने सबसे पहले योजना बनाकर पूरे गांव को खाली करवाया…फिर वहां मोर्चा खड़ा किया। आम जन की वेशभूषा धारण कर नक्सली गांव में बैठे रहे। कुछ नक्सली पहाड़ से भी गोलीबारी कर रहे थे। ऐसे में जवान गांव की तरफ मुड़ने लगे, लेकिन वे समझ नहीं पाए कि गांव में भी नक्सलियों ने बड़ा मोर्चा खोल रखा था। इस छोटी सी चूक ने हमारे 22 जवानों को हमसे छीन लिया। पहाड़ों से 200 किलोमीटर दूर इस गांव में नक्सली रॉकेट लॉन्चर और एलएमजी जैसे खतरनाक हथियार लेकर बैठे हुए थे। घटना में करीब 31 जवान अभी भी घायल हैं, जिनमें 13 की हालत गंभीर बताई जा रही है।

इस पूरे हमले का ताना-बाना बटालियन के कमांडर हिड़मा ने बुना था। ऐसा माना जा रहा है कि हिड़मा की मौजूदगी की सूचना बार-बार आ रही थी। वह हर नक्सली बटालियन का नेतृत्व समय-समय पर कर रहा था। नक्सलियों की बटालियन नंबर वन के मुख्य लड़ाकों के साथ ही कोंटा, जगरगुंडा, बासागुड़ा और एरिया कमेटी मौजूद थी। आमतौर पर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की सीमा पर गांव की बटालियन का इलाका है।

कौन है यह हिड़मा ?

कद – काठी में छोटा दिखने वाला हिड़मा उर्फ संतोष ना जाने कितने ही नामों से जाना जाता है। बताया जाता है कि यह पढ़ा तो दसवीं तक है , लेकिन इतनी फर्राटेदार इंग्लिश बोलता है कि बड़े-बड़े लोग इसके सामने फेल हैं। इन चीजों से साफ तौर पर जाहिर होता है कि हिड़मा को अर्बन नक्सलियों की शह प्राप्त है और अच्छा खासा प्रभाव है। हिड़मा की खास पहचान यह भी है कि उसके बाएं हाथ की उंगली कटी हुई है। वह एक हाथ में बंदूक, तो दूसरे हाथ में नोटबुक लेकर चलता है। इतनी कम उम्र में ही हिड़मा नक्सलियों की टॉप सेंट्रल कमेटी का सदस्य भी है ।

  • साल 2010 में ताड़मेटला में हुए हमले में 76 जवानों की मौत की वजह हिड़मा और उसकी टीम रही थी।
  • इसके साथ ही साल 2013 में झीरम कांड का मास्टरमाइंड हिड़मा को माना जाता है।
  • साथ ही साथ 2017 में बुर्कापाल में हुए हमले में भी हिड़मा की अहम भूमिका रही थी। और ना जाने कितनी ही वारदातों को वह अंजाम दे चुका है।

शव भी नहीं देना चाहते थे नक्सली

इस खौफनाक वारदात के बाद भी अगले दिन नक्सली हथियारों से लैस होकर गांव में ही मौजूद थे। इतनी क्रूरता के बाद वो अब हेलीकॉप्टरों को भी जवानों का शव लेने नहीं देना चाहते थे। जैसे-तैसे करके वायुयान के माध्यम से जवानों के शव को बाहर  निकाला गया। सबके पैर में लंबी रस्सी बांध दूसरे छोर से खींचा गया। फिर उठाकर हेलीकॉप्टर तक ले जाया गया। दरअसल, नक्सली शवों के नीचे भी बम लगा देते हैं। ऐसे में यह जवानों के लिए और भी खतरनाक हो सकता है, इसीलिए इस तरीके से शव को उठाना जरूरी हो जाता है । इतनी घिनौनी वारदात के बाद भी नक्सलियों का दिल नहीं पसीजा और रेस्क्यू टीम के 1 जवानों को भी नक्सलियों ने प्रेशर बम से उड़ा दिया। हालांकि गनीमत रही कि जवान घायल है उसकी जान बच गई।
नक्सली जवानों से सात AK47 राइफल, दो इंसास राइफल और एक एलएमजी भी लूट कर ले गए।

नक्सलियों और पुलिस ने जवानों के  बीच का यह द्वंद ना जाने कितने सालों से चला आ रहा है। सरकार हर बार नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिए नए-नए ऑपरेशन चलाती है, लेकिन स्थिति जस की तस है । हालांकि पिछले सालों की तुलना में इस दशक में नक्सली वारदातों की संख्या में कमी आई है, लेकिन अब भी देश के जवान आंतक का शिकार हो रहे । सवाल तो यह है कि इतने आधुनिक हथियार बीजीएल, यूबीजीएल और कैची बम जैसे हथियार नक्सलियों को सप्लाई कौन करता है? ऊपर से जवान अगर कोई प्लानिंग करते हैं तो वह नक्सलियों को पहले ही पता चल जाती है और वे सतर्क हो जाते हैं।

बात करें छत्तीसगढ़ की प्रमुख नक्सली वारदातों की तो

  • 15 मार्च 2007- बीजापुर जिले के रानीबोदली कैंप पर जबरदस्त हमला हुआ। जिसमें हमारे 55 जवान शहीद हो गए थे।
  • 06 अप्रैल 2010- सुकमा के ताड़मेटला में नक्सलियों ने सीआरपीएफ जवानों पर धावा बोल दिया था, जिसमें सेना के 76 जवान शहीद हो गए थे।
  • 25 मई 2013- झीरम घाटी का यह हमला बस्तर जिले में कांग्रेस के काफिले पर हुआ था। जिसमें 31 कांग्रेसी और कई जवान शहीद हुए थे इस हमले से पूरा प्रदेश या कहें कि पूरा देश हिला कर रख दिया था।
  • 12 अप्रैल 2015- बस्तर जिले के दरभा में एंबुलेंस को नक्सलियों ने अपना शिकार बनाया। जिसमें 15 जवान सहित ड्राइवर और स्वास्थ्य कर्मी शहीद हो गए।
  • 6 मई 2017- सुकमा के कसालपाड़ में घात लगाकर हमला किया था। जिसमें सेना के 14 जवान शहीद हुए थे।
  • 25 अप्रैल 2017- सुकमा जिले की दुर्घटना जहां नक्सली हमले में 25 जवान शहीद हो गए।
  • 23 मार्च 2020- सुकमा जिले के मिनपा में हमला हुआ था, जहां 17 जवान शहीद हुए।
  • 23 मार्च 2021- नारायणपुर में जवानों की बस को विस्फोट से उड़ाया गया, जिसमें 5 शहीद हुए थे।
  • 03 अप्रेल 2021- बीजापुर की घटना, जिसमें 22 जवान शहीद हो गए। इस घटना से पूरे देश में आक्रोश का माहौल है।

हाल ही में इन नक्सलियों ने एक शांति प्रस्ताव भेजा था, जिसमें बातचीत का रास्ता अपनाने की बात कही गई थी। इस मसले पर सरकार विचार कर पाती, इससे पहले ही माओवादियों ने पीठ पर छूरा घोप दिया।

क्या हो सकता है रास्ता ?

गृह मंत्री ने मीटिंग ली, जिसमें उन्होंने नक्सलियों को घर में घुसकर मारने की बात कही है। केंद्रीय फोर्स को भी छत्तीसगढ़ लाने की बात कही जा रही है। अब सरकार के पास केवल 2 ही रास्ते बचते हैं या तो पूरी फोर्स को इकट्ठा कर नक्सलियों को उनके घर में घुसकर जड़ से खत्म कर दिया जाए या फिर दूसरा रास्ता यह भी हो सकता है कि इन माओवादियों को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया जाए और उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जाए ।