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सिम्स बना रेफरल सेंटर, 30 दिनों में 102 मरीजों को भेज दिया गया दूसरे अस्पताल

सिम्स रेफरल सेंटर बनता जा रहा है। यहां सीनियर और काबिल डॉक्टर होने के बाद भी मरीजों का इलाज करने के बजाय उन्हें…

सिम्स रेफरल सेंटर बनता जा रहा है। यहां सीनियर और काबिल डॉक्टर होने के बाद भी मरीजों का इलाज करने के बजाय उन्हें निजी अस्पतालों का रास्ता दिखाया जा रहा है। इसमें डॉक्टर से लेकर कर्मचारियों तक का कमीशन होता है। 30 दिनों के भीतर ऐसे ही 102 मरीजों को सिम्स से दूसरे अस्पताल भेज दिया गया। सिम्स में रोज 1200-1400 मरीज पहुंचते हैं, यहां 672 बेड हैं। वहीं यहां पर भर्ती ज्यादातर मरीज गरीब व मध्यम तबके का होता है। सिम्स से प्रतिदिन 8 से 10 मरीज निजी अस्पताल में भेजे जा रहे हैं।

दलालों के अलावा कर्मचारी व डॉक्टर बीमारी का दिखाते हैंं भय : सिम्स में जैसे ही कोई गंभीर रोगी आता है, दलाल उसके परिजनों के पीछे पड़ जाता है। वह तरह-तरह की कहानी गढ़कर सिम्स में इलाज नहीं होने की जानकारी देते हैं। इस खेल की दूसरी कड़ी वार्ड के कर्मचारी होते हैं, जो जानबूझकर लापरवाही बरतते हैं ताकि मरीजों के परिजन अस्पताल छोड़ने पर मजबूर हो जाएं। अंत में डॉक्टर सलाह देकर निजी अस्पतालों में भेज ही देते हैं।

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रामजी को पथरी थी, ड्राइवर उसे छुट्टी कराकर ले गया

कोरबा बरपाली निवासी रामजी साहू सिम्स में पथरी की शिकायत लेकर आया था। 21 अक्टूबर को वह मेडिकल वार्ड में भर्ती हुआ। 22 को वह गायब हो गया। उसका नामा लामा रजिस्टर में मिला। जहां वह भर्ती था उस वार्ड के एक अन्य मरीज के परिजन ने बताया कि रामजी के रिश्तेदारों से एक गाड़ी ड्राइवर आकर मिला था। बाद में वही उन्हें अस्पताल से अपने साथ निजी अस्पताल ले गया। ड्राइवर उस वार्ड में हमेशा आता है और गंभीर मरीजों से इलाज के संबंध में बातचीत करता है।

केस-1

निजी अस्पतालों के चक्कर में जमीन व मकान तक बेचना पड़ता है : सिम्स के मरीजों को निजी अस्पतालों में अच्छे इलाज का हवाला देकर भेज दिया जाता है पर इसका खामियाजा मरीजों के परिजनों को भुगतना पड़ता है। निजी अस्पतालों में सामान्य बीमारियों के इलाज में भी लाखों रुपए लिए जाते हैं। ऐसे में मरीज के परिजनों को जमीन मकान बेचकर या ब्याज पर रकम लेकर बिल का भुगतान करना पड़ रहा है।

गलत नंबर लिखते हैं जानबूझकर : सिम्स के मरीजों को दूसरे अस्पताल भेजते समय केजुअल्टी के रजिस्टर में गलत मोबाइल नंबर दर्ज कराया जाता है ताकि उसका पता न चल सके। अधिकांश लामा रजिस्टर में नाम-पता भी स्पष्ट नहीं लिया गया है।

डॉक्टर ने निजी अस्पताल का नाम लेकर वहां जाने के लिए कहा

लामा रजिस्टर में दर्ज मस्तूरी किरारी निवासी 65 वर्षीय सहोदरा बाई पति सेवक राम की भी ऐसी ही कहानी है। 20 अक्टूबर को सिम्स में किडनी का प्रॉब्लम लेकर अाई थी। उसे फीमेल मेडिकल वार्ड में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने कहा कि वहां जो इलाज होना था वह हो चुका। आगे इस बीमारी का इलाज कराने उसे दूसरे अस्पताल जाना पड़ेगा। डॉक्टर ने उसे उस डाॅक्टर का पता दिया और सहोदरा बाई के परिजन उसे लेकर चले गए। यह बात भी उसके बेड के पास आए दूसरे मरीज ने बताई।

केस-2

सबका अलग-अलग कमीशन

निजी अस्पताल में रेफर करने का सभी का अलग अलग कमीशन होता है। इनमें दलालों को एक मरीज के पीछे 2-3 हजार रुपए मिल जाता है। वहीं वार्ड के कर्मचारियों का, जिनकी इसमें भूमिका होती है उन्हें संबंधित अस्पताल 500-1000 रुपए देता है। इसके बाद डॉक्टरों का कमीशन संबंधित अस्पताल के बिल से तय होता है। इसमें एक मरीज के पीछे 10 हजार से 2-3 लाख रुपए तक मिल जाते हैं।

कुछ मामलों में कार्रवाई की गई है-मूर्ति

सिम्स के प्रभारी डीन डॉ. रमणेश मूर्ति के अनुसार अस्पताल में जो सुविधाएं नहीं है उसके लिए मरीज को रेफर किया जाता है। यह उनकी मर्जी से होता है। सिम्स के बाहर दलाल घूमते रहते हैं। दो-तीन के खिलाफ एफआईआर कराया गया है। इसमें संलिप्त स्टाॅफ को भी सजा दी गई है। अब पहले से काफी कमी आई है। सिम्स में बेड फुल होने की दशा में भी उन्हें यहां रोका नहीं जा सकता।

सिम्स में ये सुविधाएं नहीं हैं

सिम्स में कार्डियोलाजिस्ट, न्यूरोलाजिस्ट नहीं हैं। इसी तरह बर्न के लिए प्लास्टिक सर्जन भी नहीं है। यहां सुपरस्पेशलिटी सुविधाओं का अभाव है। सोनोग्राफी मशीन है पर नंबर वेटिंग में आता है और इसमें हफ्ता से लेकर 10 दिन भी लग जाता है।

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