Thu. Nov 14th, 2019

रायगढ़ क्रिकेट जगत का अनमोल हीरा स्व.’अशरफ हुसैन’ का सफरनामा

रायगढ़ :- अपने कुशल व्यवहार , शांत चित्त और परिस्थिति के अनुकूल खेलने के अंदाज और अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी के दम पर गेदबाजों के नाक में दम करने वाले अशरफ हुसैन पूरे रायगढ़ जिले में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। 1993 से क्रिकेट जगत में कदम रखने वाले वाले अशरफ हुसैन का नाम पूरे जिले में बड़े ही सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। अशरफ हुसैन अब हमारे बीच नहीं है। उनकी यादों को शब्दों में समेट पाना असम्भव है फिर भी मेरा एक छोटा सा प्रयास है उनकी उन यादों को जो मेरे मन में है और कुछ लोगों से उनकी दास्तां सुनी है उसे कलम के माध्यम से पाक मन से संजोने का प्रयास कर रहा हूं।

जीवन-परिचय :-
अशरफ हुसैन भैया का जन्म 28 जून सन 1980 को हुआ था अशरफ हुसैन के पिता स्व. अमजद हुसैन और माता जी का नाम श्रीमती जैबुन निशा है। परिवार में बड़े भाई असलम हुसैन, छोटे भाई आशिक हुसैन, बहन जशमुन निशा सहित अपने भतीजे-भतीजियों व भांजे-भांजियों के साथ अशरफ भैया खुशी पूर्वक परिवारिक जीवनयापन करते थे। घर में पिताजी के गुजर जाने के बाद बड़े भाई असलम हुसैन पर परिवार की जिम्मेदारी बढ़ गयी और वो घर के मुखिया के रूप में मौजूद रहे हैं। अपने पुरे परिवार को असलम हुसैन भैया ने एक धागे में पिरोकर रखा था। अशरफ और आशिक के रूप में अपने दोनों लाड़ले भाइयों के लिए असलम भैया का स्नेह कभी कम नहीं हुआ। जीवन के दु:ख-सुख में अशरफ भैया के सर पर असलम भैया ने पिता के समान हाथ रखकर अपना हर कर्तव्य निभाया है। कभी डाट तो भी प्यार से अशरफ, आशिक व पुरे परिवार को हमेशा हर बात की समझाईश व खुशियां दी है। समय-समय पर सही गलत का ज्ञान देकर उचित मार्गदर्शन करने वाले असलम भैया इस परिवार के रीढ़ के हड्डी हैं। अशरफ भैया और आशिक भैया ये दोनों भाई इनकी ताकत के साथ घर के मजबूत आधार स्तम्भ हैं। अपने जीवनकाल में अशरफ भैया ने असलम भैया को सदैव पिता के समान स्नेह व सम्मान दिया हैं। उन्हें कभी भी पलटकर जवाब नहीं दिया है और हमेेेशा उनके आदेश को शिरोधार्य किया है।
▪️कुछ दिन पूर्व मैं जब असलम भैया के पास बैठा था तो उनके मन में अशरफ भैया प्रति जो भाव है स्वतः ही सामने आ गया और उसी वक्त असलम भैया मुझे एक किस्सा बताया “असलम भैया जो भी काम अशरफ भैया को पूरा करने को कहते थे उसे पुरा करके क्रिकेट खेलने निकल जाया करते थे और इधर असलम भैया को पता ही नहीं होता था कि अशरफ ने उनके द्वारा दिया हुआ कार्य को पूर्ण कर लिया है उसके पश्चात क्रिकेट खेलने गया है। जब अशरफ भैया शाम को खेल के वापस आते थे और काम पुरा होने की बात कहते थे तो असलम भैया काम पूर्ण होने की सूचना देर से मिलने पर थोड़ी सी उनकी खिंचाई भी कर देते थे। एक नाराजगी उनके चेहरे पर जरूर आती थी वो भी इसलिए की अशरफ भैया द्वारा काम पूर्ण होने की सूचना उन्हें समय पर नहीं दी जाती थी और वो क्रिकेट खेलने बिना बताए कहीं भी चले जाते थे लेकिन अपने छोटे भाई के क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखकर असलम भैया भीतर ही भीतर गर्व महसूस करते थे क्योंकि अशरफ भैया जहां-जहाँ क्रिकेट खेलने जाते थे वहां लगभग जीत दर्ज कर रायगढ़ शहर का नाम रोशन करते थे।” अशरफ भैया का अपने छोटे भाई आशिक हुसैन के साथ लगाव बेहद करीबी और प्यार भरा रहा है क्योंकि दोनों ही एक साथ क्रिकेट व फुटबॉल खेलते थे। अपने छोटे भाई के प्रति अशरफ भैया का व्यवहार बिल्कुल एक मित्र के जैसा ही रहा है। रायगढ़ क्रिकेट जगत में अशरफ-आशिक की जोड़ी अत्यधिक प्रचलित रही है लोग दोनों की जोड़ी की तारीफ करते नहीं थकते थे। आशिक भैया ने भी हमेशा बड़े भाई का हर परिस्थिति में साथ दिया और कभी भी उन्हें पलट कर जवाब नहीं दिया। अपने परिवार में अशरफ भैया बच्चों को अत्यधिक स्नेह करते थे और घर में आफताब, आफरीन, आशिया, आयशा, मुस्कान और मिराज के साथ हंसी-ठिठोली करते हुये उनके साथ खेलना और समय व्यतीत करना उन्हें भांता था । अशरफ भैया अपने परिवार से बहुत प्यार करते थे। अशरफ भैया का अपने भरे पूरे खुशहाल परिवार को अकस्मात छोड़कर चले जाना अकल्पनीय व अत्यंत ही पीड़ादायक है। प्रकृति की क्रूरता ही है कि गत 29 अगस्त 2019 को अशरफ हुसैन भैया का युवावस्था में ही स्वर्गवास हो गया। उनके पूरे परिवार सहित हम सभी के लिए उनका न होना अपूर्णीय क्षति है।

सामाजिक जीवन :-
अशरफ भैया के सामाजिक जीवन के विषय में कुछ लिखना चाहूं तो मेरी कलम नहीं लिख पाएगी बस ये समझ लीजिये की “यदि आप किसी मुसीबत में हैं और आपने अशरफ भैया को रात को 2 बजे भी फोन करके किसी भी प्रकार की सहायता के लिए आवाज दिया तो वो बेझिझक बिना कुछ सोचे- समझे आपके सहयोग के लिए तत्काल आ जाएंगे।” ये बात उन्हें उनके सामाजिक जीवन में सबसे बेहतर व श्रेष्ठ बनाती थी। इसी “सहयोगात्मक व्यवहार” के कारण ही कई बार उन्हें तकलीफों का भी सामना करना पड़ा । “चक्रधर नगर की शान अशरफ खान” के नाम से लोग उन्हें जानते थे। किसी परिचित के दुःख या सुख हो वो हमेशा अपनों के लिए खड़े रहते थे और ये बात इनकी फितरत बन चुकी थी। अशरफ भैया का हृदय बेहद कोमल था इस कारण वो तत्काल भावना में बह जाते थे और इसी वजह से कई लोगों ने इनका दोहन भी किया। अशरफ भैया रायगढ़ के युवाओं के बीच प्रसिद्ध थे। लोग उन्हें प्यार से अपने इच्छानुसार मामा, बड़े मिंया, दादा, कप्तान, भाईजान, चक्रधर नगर की शान जैसे कई नामों से अलंकृत करते थे। अशरफ भैया की सबसे अच्छी खूबी ये थी कि वो सबको प्यार से बकायदा जवाब देते थे उनका यही व्यवहारिक मीठापन सभी को बेहद पसंद था। युवाओं को एक साथ लेकर चलने में उन्हें महारथ हासिल था। रायगढ़ शहर का ऐसा कोई मोहल्ला या चौक नहीं जहां अशरफ भैया को सम्मान व स्नेह न मिला हो। शहर के युवाओं के बीच बेहद प्रचलित माने जाने वाले अशरफ भैया ग्रामीण खिलाड़ियों व वहां के नागरिकों में भी अत्यधिक लोकप्रिय थे।

▪️अशरफ भैया हर वर्ग के लोगों के दिलों में अपने मिलनसारिता के कारण सबके चहेते थे। चक्रधर नगर चौक में जब इनका जन्मदिन मनाया जाता था न तब लगता था कि “ये है अशरफ हुसैन” कसम से, सैकड़ों युवाओं की टोली उनका जन्मदिन मनाने के लिए चक्रधर नगर चौक आ जाया करती थी। सोशल मिडीया में उस दिन अशरफ भैया को बधाई देने वालों का बधाई संदेश ही दिखता था।100 प्रतिशत सच बात कह रहा हूँ अशरफ भैया के पास उनके चाहने वालों के साथ-साथ, जिले के खिलाड़ियों सहित जितने युवाओं की फौज थी ना उतनी बड़ी युवाफौज शहर के किसी भी राजनैतिक व्यक्ति के पास नहीं थी। राजनीति से कोसों दूर होने के कारण अशरफ भैया ने कभी भी अपने युवाओं की शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया जबकि वो चाहते तो एक युवाशक्ति बनकर शहर में अपना बड़ा नाम स्थापित कर सकते थे लेकिन अशरफ भैया ने राजनीति से कोसों दूर अपना ध्यान सिर्फ क्रिकेट में ही लगाया। वो क्रिकेट के लिए ही जीते थे। क्रिकेट ही उनका जीवन था। वो क्रिकेट खेलने में खुद को व्यस्त रखा करते थे। उनका सबसे बड़ा शौक अच्छे-अच्छे कपड़े पहनना था। अशरफ भैया जब भी घर से सैर-सपाटा करने निकलते थे तो हमेशा टीपटॉप में तैयार होकर ही निकलते थे। उनका एक और शौक अच्छे कपड़ो में खुद की तस्वीर को कैमरे में कैद करना रहा है। लगभग हर तरह की तस्वीर आपको उनके फेसबुक वाल में दिख जाएगी। हर इंसान में समय के साथ बदलाव होता है लेकिन अशरफ भैया का कोमल हृदय कभी नहीं बदला इसी कारण कई जगहों पर उन्हें गलत लोगों ने उपयोग किया जिसका कुछ गलत परिणाम भी सामने आया। अशरफ भैया हमेशा से किसी का दुःख नहीं देख पाते थे जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ क्योंकि मैंने भी अपने पिताजी के लिए 2 या 3 यूनिट ब्लड की व्यवस्था के लिए उनसे निवेदन किया था जिसे सुनते ही वो तत्काल मेरे पास आ गए और मुझे धीरज देते हुए कहा की :- “तेरा बड़ा भाई तेरे पास है डर मत सब व्यवस्था हो जाएगी” और उन्होंने मेरी परेशानी दूर करते हुए मेरे पिताजी के लिए 3 यूनिट ब्लड की व्यवस्था कर दी। ये किस्सा केवल मेरा ही नहीं है मेरे जैसे दर्जनों लड़को के लिए वो मुसीबत में खड़े हो जाया करते थे। लड़ाई-झगड़े से लेकर हर चीज में वो केवल अपने दिल की ही बात सुनते थे। सच के लिए जीना उन्हें आता था। शहर के युवाओं के साथ इनका रोज का मिलना होता रहता था। निडर व सहयोगात्मक प्रवृत्ती के कारण इनकी छत्रछाया में कई युवाओं, बुजुर्गों ने खुद को सुरक्षित भी महसूस किया है। अशरफ भैया अपने किसी भी परिचित के सुख में शामिल भले ही न हो पाए हों लेकिन दुःख में बिना बुलाये ही आ जाने की अच्छाई इनके भीतर समाहित थी और यही एक प्रमुख कारण था कि अशरफ भैया हम सभी के प्रिय रहे हैं। समाज में अशरफ भैया जैसे व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं। आज हमारे बीच इनका न होना एक ऐसी क्षति है जिसका कोई विकल्प नहीं है। इतने अच्छे व्यक्तित्व का इतनी कम उम्र में ईश्वर के पास चले जाना प्रकृति की क्रूरता को दर्शाता है।

क्रिकेट जीवन :-
रायगढ़ क्रिकेट जगत में सन 1993 से क्रिकेट की दुनियां में कदम रखने वाला अशरफ हुसैन आज टेनिस बाल क्रिकेट जगत के आधार स्तम्भ के साथ द्रोणाचार्य के रूप माने जाते हैं। लगभग 26 वर्ष के क्रिकेट करियर में अपने खेल के माध्यम से इन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया है जिसकी चाह हर क्रिकेटर को होती है। अशरफ भैया ने अपने क्रिकेट खेल की शुरुआत “चक्रधर नगर युवा क्रिकेट क्लब” से की है। रायगढ़ जिले में तब टेनिस बॉल क्रिकेट टूर्नामेंट रायगढ़ स्टेडियम, रामलीला मैदान, संजय मैदान और नटवर स्कूल के मैदान में ही अधिक आयोजित होता था। उस वक्त रायगढ़ में बड़ी-बड़ी क्रिकेट टीमें हुआ करती थी। चक्रधर नगर युवा क्रिकेट क्लब की तरफ से अशरफ भैया न अपने पहली क्रिकेट टूर्नामेंट एक बल्लेबाज के तौर पर खेलना शुरु किया और लगातार क्रिकेट खेलते रहे। धीरे-धीरे उनका खेल परवान चढ़ने लगा। खेल प्रेमियों और वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए अशरफ भैया “एक बेहतरीन बल्लेबाज” के रूप में जाने लगे। चक्रधर नगर युवा क्लब को दर्जनों ट्रॉफी जिताने में अशरफ भैया की बल्लेबाजी व क्षेत्ररक्षण जमाव का विशेष योगदान हुआ करता था। फिर एक ऐसा दौर आया की अशरफ भैया की बल्लेबाजी देखने मेरे जैसे छोटे-छोटे क्रिकेटर, आसपास के सभी खेलप्रेमी और खिलाड़ी आया करते थे। सभी को अशरफ भैया की बल्लेबाजी देखने का इंतजार हुआ करता था और जब अशरफ भैया बल्ला पकड़कर मैदान में उतरते थे तो मैदान में एक अलग ही कौतूहल छा जाया करता था। उस वक्त विरोधी गेंदबाज को सोचना पड़ जाता था कि इस बल्लेबाज को कैसे रोका जाये क्योंकि अशरफ भैया एक ऐसे बल्लेबाज थे जो परिस्थितियों के अनुकूल हर प्रकार से गियर बदलने में माहिर बल्लेबाज थे। अच्छे-अच्छे गेंदबाज उनके सामने गेंद फेंकने से डरते रहते थे और सोचते रहते थे कि ये कब क्या करेगा? इनका सबसे पसंदीदा शॉट पॉइंट की दिशा में चटाक से कट शॉट लगाना था। मैदान में आफ साइड खेलना इन्हें ज्यादा आरामदायक और पसन्द था। रायगढ़ जिले में इन्हें “आफ साइड के किंग” के नाम से जाना जाता था। विपक्षी टीम चाहे कितने भी फील्डर आफ साईड में लगा ले उनके बल्ले से आफ साइड शॉट में चौके-छक्के निकलता ही था। सलामी बल्लेबाज की भूमिका में इन्होंने हमेशा अपनी टीम को जीत के मुकाम तक अनेकों बार पहुँचाया है। रायगढ़ शहर के टेनिस बाल क्रिकेट के इतिहास में संजय मैदान के टूर्नामेंट में “सर्वप्रथम शतक” लगाने वाले बल्लेबाज अशरफ हुसैन ही थे। एक समय ऐसा था कि इनका खेल पूरे चरम पर था हर बड़ी टीमों के खिलाप इनका बल्ला आग उगलता था। शांत मन से कप्तानी के कारण विरोधीयों पर ये भारी पड़ते थे। धीरे- धीरे समय व्यतीत होता गया अशरफ भैया ने अपने खेल की बदौलत सैकड़ों बार मैन आफ द मैच, टूर्नामेंट में बेस्ट बैट्समैन का खिताब व प्लेयर आफ द सीरीज का खिताब, दर्जनों बार व विजेता बनकर चक्रधर नगर टीम का गौरव बढ़ाया है। समय के साथ-साथ खेल का स्तर बढ़ता गया बड़ी-बड़ी टीमें जिले में खेलने आ रही थी। रायगढ़ जिले का नाम रोशन हो और चक्रधर नगर युवा क्लब मजबूत हो इस कारण रायगढ़ शहर के श्रेष्ठ खिलाड़ियों व आसपास तहसील के खिलाड़ियों का इन्होंने चयन करते हुए “रायगढ़ इलेवन’ नाम से एक टीम का गठन किया। इस टीम में इन्होंने रायगढ़ के उन ख्यातिलब्ध खिलाडियों को रखा जिनसे इनकी और टीम के बाकी सदस्यों से अच्छा तालमेल था। उन खिलाड़ियों में से दीपांशु पाणिग्राही, विकास पाण्डेय, विनोद महेश, जय, विजय, चंदू एवं अन्य कई खिलाड़ी शामिल रहे। रायगढ़ इलेवन टीम के गठन के बाद कई टूर्नामेंट में इस टीम ने जीत दर्ज कर अशरफ भैया का कद रायगढ़ क्रिकेट में और बढ़ा दिया। आशिक-अशरफ की जोड़ी इस टीम की नींव थी। खेल का स्तर भी ऊंचा होता गया और अशरफ भैया अपनी रायगढ़ टीम को जिले के बाहर ले जाने की सोचने लगे फिर उन्होंने एक बार पुनः अच्छे-अच्छे खिलाड़ियों को मौका देने के लिए रायगढ़ चैंप्स का गठन किया। इस टीम में जिले के लगभग सभी खिलाड़ियों को अशरफ भैया ने मौका दिया जिनमें से कुछ नाम बंटू पटेल, ओमप्रकाश मीरे, विकास पाण्डेय, चंदू, प्रमोद, बाकला, दीपक पंडा, डिक्की यादव, शरद सिदार, कैलाश, जोगेन्द्र, कपिल और सचिन मिश्रा प्रमुख रहें हैं। रायगढ़ चैंप्स जैसा कि नाम से ही चैंपियन प्रतीत होता है ठीक वैसा ही प्रदर्शन इस टीम ने संयोजक अशरफ हुसैन के नेतृत्व में किया । आज रायगढ़ चैंप्स के पास रायगढ़ जिले का लभगभ हर ट्रॉफी है जो उनके शो केस की शोभा बढ़ा रहें हैं। रायगढ़ चैंप्स जिले की सर्वश्रेष्ठ टीम बनकर सामने आयी और अन्य जिलों में भी इस टीम ने दर्जनों जीत दर्ज कर रायगढ़ का नाम रोशन किया है। रायगढ़ जिले में और रायगढ़ जिले के बाहर भी रायगढ़ चैंप्स ने अशरफ भैया के नेतृत्व में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अशरफ भैया जिले स्तर से भी ऊपर अपनी टीम को ले जाना चाहते थे इस कारण उन्होंने छ.ग. व उड़ीसा राज्य के बड़े-बड़े क्रिकेट प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लगे। छत्तीसगढ़ में रायपुर ,बिलासपुर, नैला, सक्ति, चांपा, जांजगीर, खरसिया, डभरा, चंद्रपुर, सारंगढ़, अकलतरा, सरिया, बरमकेला, पत्थलगांव, घरघोड़ा, तमनार, धरमजयगढ़, जामगा, कोयलंगा, पुसौर, लैलूंगा के अलावा लगभग हर छोटे- बड़े गांवों के क्रिकेट टूर्नामेंट में टीम के साथ भाग लिया और कहीं हार नसीब हुई तो कहीं जीत दर्ज हुई। जब ग्रामीण क्षेत्रों में अशरफ भैया की टीम जीत दर्ज करती थी तो वहां के बुजुर्गों व दर्शकों द्वारा उन्हें मैच समाप्ति के बाद गांव में ही रोक लिया जाता था ताकि अशरफ भैया के साथ वो समय बिता सके। अशरफ भैया भी बड़े प्यार से ग्रामीणों के साथ वहां रुकते और अपने मन से ग्रामीणों को जीत की खुशी में पार्टी दे देते थे। अशरफ भैया ने क्रिकेट में जो नाम कमाया उसका कोई सानी नहीं है। आज जिले का ऐसा कोई क्रिकेट खिलाड़ी और क्रिकेट प्रेमी नहीं है जो अशरफ भैया को न जानता हो। रायगढ़ में टेनिस बाल क्रिकेट की पहचान अशरफ भैया से है उसके पीछे मुख्य कारण है उनका क्रिकेट के प्रति दीवानगी, अनुशासन व अन्य खिलाड़ियों को अवसर प्रदान करना है। टेनिस बाल क्रिकेट में जितनी अच्छी बल्लेबाजी अशरफ भैया करते थे उतनी ही बढ़िया बल्लेबाजी ड्यूज बाल क्रिकेट में वो भी बिना प्रैक्टीस के करते थे। टेनिस बॉल के खिलाड़ी होते हुए भी उन्होंने कभी ड्यूज बॉल क्रिकेट के लिए कभी प्रैक्टीस नहीं किया लेकिन प्रदर्शन में उनकी कभी गिरावट नहीं आती थी। जब उनसे कोई पूछता की भैया आप बिना प्रैक्टीस के इतनी बढ़िया बल्लेबाजी कैसे करते हैं ? तो उनका जवाब होता था “देख भाई क्रिकेट खेलने के लिए हौसला और दीवानापन होना चाहिए जब हाथ में बल्ला हो और मन में हौसला हो जीत दर्ज करने का तो ये सब अपने आप हो जाता है” उनका जवाब भी बिल्कुल उनके जैसा मोटिवेट करने वाला था। हमारे जैसे दर्जनों खिलाड़ियों को उन्होंने क्रिकेट के गुर सिखाए हैं और अपने साथ खेलने का अवसर देते हुए मार्गदर्शन भी किया है। सीना चौड़ा हो जाता है किसी भी खिलाड़ी का जब लोग ये बोलते हैं की ये रायगढ़ चैंप्स का खिलाड़ी है। ये नाम और शोहरत आज अशरफ भैया की देन है। 1993 से 2019 तक के अपने क्रिकेट जीवन में अनगिनत व्यक्तिगत पुरस्कार अर्जित कर चुके थे। एक कप्तान के रूप में सबसे अधिक विजेता ट्रॉफी उठाने का सौभाग्य इनके अलावा जिले में दूसरे किसी भी खिलाड़ी को नसीब नहीं हुआ है ये अपने आप में “गर्वीला एवं स्वर्णिम इतिहास” है। रायगढ़ टेनिस बाल क्रिकेट जगत का “आधार स्तंभ अशरफ हुसैन” अब हमारे बीच नहीं हैं ये सोचकर मन बेहद विचलित हो उठता है। अब उनके बिना रायगढ़ टेनिस बाल क्रिकेट जगत “परकटे पक्षी” की तरह हो गया है। रायगढ़ जिले का ऐसा कोई मैदान नहीं जहां अशरफ भैया की याद नहीं है। उनके जैसा शांत प्रवृति व अनुशासित क्रिकेटर दूसरा कोई भी नहीं हो सकता। अशरफ भैया रायगढ़ क्रिकेट जगत के “वटवृक्ष” थे जिनकी जड़े हम खिलाड़ियों के रूप में “धरती के गर्भ” तक इतनी गहराई तक फैली हुई है जिसे चाहते हुए भी कोई तोड़ नहीं सकता है। वटवृक्ष रूपी अशरफ भैया ने हमें और हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए क्रिकेट के अलावा बहुत कुछ सीखा दिया है जो हमारे भीतर हमारी अंतिम सांस तक रहेेेगी। रायगढ़ टेनिस बॉल क्रिकेट के पर्याय बन चुके अशरफ भैया आपको कोटि- कोटि नमन है। रायगढ़ क्रिकेट की दुनियां में आप ध्रुवतारे के समान हमेशा चमकते रहेंगे।

एक अनजानी दास्तां :-
जब घर में अशरफ भैया का पार्थिव शरीर रखा हुआ था सभी लोग दुःख में गमगीन थे तो वही एक कोने में खड़ी होकर एक महिला रो रही थी। उस महिला को किसी ने नहीं पहचाना की वो कौन है लेकिन जब पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई देने के लिए उनके अंतिम यात्रा में ले जाने के बाद परिवार के एक महिला सदस्य ने उनके पास जाकर उनका परिचय पुछा की “आप कौन हैं माफ कीजियेगा हम आपको नहीं पहचान पाएं” उस महिला ने जवाब दिया कि “यहां मैं किसी को जानती, न ही अशरफ भैया भी मुझे नहीं जानते हैं और न ही यहां कोई मुझे जानता है। मैं अशरफ भैया के अंतिम दर्शन हेतु यहां आयी हुई हुं क्योंकि वो ऐसे इंसान हैं जिन्होंने मेरे दुःख के क्षण में मेरा साथ देते हुये मेरी सहायता किया है। हुआ कुछ ऐसा थी कि “मेरे 9 साल के छोटे बच्चे को खून की आवश्यकता थी और मैं परेशान थी क्योंकि उस ग्रुप का ब्लड नहीं मिल रहा था। मेरे बच्चे की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी तब अचानक से अशरफ भैया अस्पताल में अपने किसी कार्य से आये हुए थे मेरी परेशानी को देखते हुए वो मेरे पास आये और पूछा की “क्या हो गया यूं परेशान क्यों हो रही हो” तो मैंने अपनी पीड़ा उन्हें बताई जिसे सुनकर उन्होंने कहा की “आप चिंता न करो मैं ब्लड की व्यवस्था करता हूँ “और उन्होंने अपने स्तर पर प्रयास करते हुए ब्लड की कमी को दूर किया और ब्लड डोनेट की प्रक्रिया को स्वयं पुरा कर मेरी सहायता किया। एक अनजान व्यक्ति ने देवदूत बनकर मेरी मदद की जिनका नाम तक मुझे नहीं पता था और हड़बड़ी व परेशानी के कारण मैं उनका नाम भी नहीं पूछ पाई और न ही शुक्रिया अदा कर पाई लेकिन आज जब फेसबुक के माध्यम से उनकी मृत्यु के विषय में उनकी तस्वीर देखी तो मुझे पता चला की मेरी मदद करने वाला वो अंजान मसीहा का नाम अशरफ हुसैन है और अब वो इस दुनियां से अलविदा कह चुका है ये देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं उनके अंतिम दर्शन हेतू उन्हें देखने के लिए चली आई ” ऐसी शख्सियत का मालिक जो किसी अनजान के लिए भी नि:स्वार्थ सहायता की भावना रखता है समाज में विरले ही मिलेंगे।

मित्र व स्नेही जन :-
यूं तो अशरफ भैया हर किसी को पसन्द करते थे लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई खास और अहम व्यक्ति महत्व रखता है बस ऐसे ही अशरफ भैया के लिए भी कुछ खास लोग थे जिन्हें वो दूसरों से अधिक स्नेह करते थे उनमें से उनके खास मित्र महेंद्र सिदार, बंटू पटेल, दिनेश यादव (दीनू), दिनेश यादव दीनू ,अनूप रतेरिया भैया, शिवकाशी, कुलदीप नरसिंह, हरीश सहिस, देव यादव चांद खान, अल्ताफ खान और लोकेश साहू बेहद करीबी थे। अशरफ भैया ने अपने जीवन समाप्ति के अंतिम कुछ महीनों में इन्हीं सभी स्नेहीजनों व मित्रों के साथ अपना समय व्यतीत किया था। आज उन सभी को अशरफ भैया की अप्रत्याशित रूप से स्वर्गवास होने पर अत्यधिक दुख है।

श्रद्धांजलि :-
युवाओं के बीच लोकप्रिय अशरफ भैया की अंतिम यात्रा में उनको कंधा देने के लिए कम से कम 1800-2000 छोटे-बड़े, परिवार से जुड़े हुए व उनके चाहने वाले उपस्थित थे। ऐसी जनभीड़ बहुत कम लोगों के अंतिम यात्रा पर देखने को मिलती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की हमारे अशरफ भैया को रायगढ़ के लोग कितना स्नेह और सम्मान करते थे। रायगढ़ क्रिकेट जगत के आधार स्तंम्भ अशरफ हुसैन भैया को उनके मित्रों, उनके चाहने वालों सहित रायगढ़ जिले के सभी क्रिकेट खिलाड़ियों की तरफ से अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कोटि-कोटि नमन..!

40 वां का कार्यक्रम :-
· दिनांक 08- 10- 2019 दिन – मंगलवार,
· समय -सुबह 8.00 बजे कुरआन खानी ।
· सुबह 9 बजे – मिलाद-तकरीर (ख्वातीनो का)।
· सुबह 11 बजे – फातिहा ।
· दोपहर 12:30 बजे से नियाज का खाना (ग्यारहवीं शरीफ)।
· स्थान:- निवास स्थान विजयपुर महर्षि स्कूल के आगे रायगढ़ छ.ग. में कार्यक्रम आयोजित है। आप सभी इष्टजनों व उनके चाहने वालों को सूचना मिले ऐसी मेरी दिली इच्छा है। आप सभी उपस्थित होकर पुण्यात्मा की शान्ति हेतू प्रार्थना करें।

विकास पाण्डेय
रायगढ़ छ.ग. |

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