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नक्सल दहशत / इन 5 गांवों में नहीं जाते राजनीतिक दल, ग्रामीणों ने यहां न चुनावी शोर सुना न प्रत्याशी देखा

  • यहां मतदान से ज्यादा लोगों की जिंदगी का सवाल, नहीं जाता सरकारी महकमा

राजनांदगांव. चुनावी शोर, प्रत्याशियों की धमक, दलों के वादे और दावे जीत पर आतिशबाजी… चुनाव में मतदाताओं को रोज इनसे दो-चार होना पड़ता है। वहीं नक्सल प्रभावित सुदूर गांवों में ऐसा नजारा मुमकिन नहीं है। यहां जिंदगी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रहती। कुछ ऐसे ही पांच गांवों की तस्वीर जहां मतदाताओं की दिलेरी ने लोकतंत्र को जिंदा रखा है।

बुकमरका: पांच किमी दूर पैदल जाते हैं मतदान करने 

मोहला-मानपुर विधानसभा का सबसे आखिरी छोर का गांव है बुकमरका। इस गांव में करीब 60 मतदाता हैं। यह कोराचा पंचायत में आता है। मानपुर से यह गांव कच्चे और पहाड़ीनुमा रास्ते से होकर 17 किमी दूर स्थित है। यहां के मतदाता पांच किमी दूर पहाड़ के नीचे परदोनी आते हैं। वहीं अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। यहां 22 घरों में करीब 160 लोग निवास करते हैं। कोराचा पंचायत के अंतर्गत आने वाला यह गांव करीब 1950 से यहां बसा हुआ है। वर्तमान में तीसरी पीढ़ी के लोग यहां निवास कर रहे हैं। ग्राम प्रमुख चमरू राम और कंतूराम ने बताया कि चुनाव प्रचार में कभी आए नहीं। फिर भी वे वोट डालने जाते हैं।

72.45% मतदान पिछली बार हुआ था 79.64% पुरुष मतदाता 65.24% महिला मतदाता

 

 

1. मलैदा: वोट डालने एक दिन पहले निकलते हैं 95 वोटर्स

डोंगरगढ़ विधानसभा के इस गांव में 95 वोटर्स हैं। वैसे तो गांव गातापार पंचायत का हिस्सा है, लेकिन विधानसभा में इनकी पोलिंग बूथ करेलागढ़ गांव में होती है। मलैदा से करेलागढ़ की दूरी 20 किमी. की है। बूथ तक पहुंचने का रास्ता या तो पैदल तय करते हैं या फिर दुपहिया वाहन से। नक्सल दहशत की वजह से यहां कभी प्रचार की गाड़ियां भी नहीं घुसती हैं। इसके चलते कभी इस गांव के मतदाताओं ने प्रत्याशियों के चेहरे तक नहीं देखे। हर बार चुनाव में गांव या क्षेत्र का कोई जानकार ही बताता है कि किस चिन्ह पर वोट करना है। कभी नक्सलियों ने इस पूरे गांव को खाली करा दिया था, तब ग्रामीणों को गातापार कैंप में रहना पड़ा था।

78.29% मतदान पिछली बार हुआ था 79.20% पुरुष मतदाता 79.04% महिला मतदाता

2. कटेमा:18 किमी की पहाड़ी पार कर जाते हैं पोलिंग बूथ

खैरागढ़ विधानसभा का अतिसंवेदनशील गांव है कटेमा। यहां अगर चारपहिया वाहन से जाना हो तो मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाओं से गुजरना पड़ता है। यहां कभी प्रचार वाहन नहीं जाते। गांव में करीब 140 वोटर्स हैं जिनके लिए पोलिंग बूथ लछनाटोला पंचायत में बनती है। लछनाटोला पहुंचने के लिए कटेमा के वोटर्स को 18 किमी. लंबे पहाड़ी को पार करना पड़ता है। इस पहाड़ी से पैदल ही मतदाता वोट करने पहुंचते हैं। नक्सलियों की धमकी को दरकिनार कर इन गांवों के लोग हर चुनाव में वोट करते हैं, लेकिन वोट किस प्रत्याशी को कर रहे हैं, ये इस गांव के मतदाताओं को भी पता नहीं होता। चुनाव का मतलब सिर्फ चुनाव चिन्ह पर मुहर लगाना है।

81.40% मतदान पिछली बार हुआ था 83.70% पुरुष मतदाता 79.04% महिला मतदाता

3.भावे: मध्यप्रदेश पर निर्भर छत्तीसगढ़ में देते हैं वोट

खैरागढ़ विधानसभा का यह गांव नक्सलियों का मजबूत गढ़ है। भावे में तो पोलिंग बूथ है, लेकिन यहां वोट करने मध्यप्रदेश की सीमा में बसे झिरिया, माउहाबाहरा, मुरकोडडो सहित आसपास के कुल 6 गांव के 450 मतदाता पहुंचते हैं। इन गांव के लोगों को भी 7 से 8 किमी. पहाड़ी के रास्तों को पार कर भावे तक पहुंचना होता है। यहां के लोग अपने तमाम जरूरतों व खरीददारी के लिए मध्यप्रदेश के गांवों पर निर्भर रहते हैं, केवल वोटिंग करने छग आते हैं। किसी तरह की अप्रिय घटना से बचने के लिए ज्यादातर वोटर एकजुट होकर एक दिन पहले ही भावे के लिए निकल पड़ते हैं। नक्सल धमकियों के बीच पोलिंग बूथ सुरक्षित पहुंचने का जिम्मा इनका खुद का है।

86.30% मत पिछली बार गिरे थे 86.90% पुरुष मतदाता 85.71% महिला मतदाता

4.दोरदे-मूचर: 2008 में पोलिंग पार्टी नहीं गई, वोटिंग बता दी

  1. दोरदे और मूचर…. 2008 के विधानसभा चुनाव में यह सबसे चर्चित गांव रहे हैं। यहां पोलिंग पार्टी पहुंची ही नहीं। वोटरों की ऊंगलियों पर निशान नहीं मिलने से खुलासा हुआ। इसके बाद मतदान हुआ व अफसरों पर कार्रवाई भी। नक्सल भय से यहां कोई भी प्रत्याशी नहीं जाता। वहीं मूचर में मटियापारा, बिरजूपारा और दोरदे के ग्रामीणों के लिए पोलिंग बूथ है। करीब डेढ़ हजार वोटर यहां मोहला-मानपुर विधानसभा के आते हैं, लेकिन प्रत्याशी प्रचार में नहीं जाते।
    दोरदे 77.85% मतदान पिछली बार हुआ था 79.69% पुरुष मतदाता 75.85% महिला मतदाता
    मूचर 74.85% वोट पिछली बार पड़े थे 80.06% पुरुष मतदाता 68.50% महिला मतदाता

     

  2. इन्हें दिक्कत तो होती है पर हर चुनाव में ये वोट जरूर देते हैं

    कटेमा के 58 वर्षीय रामसुख पोर्ते बोले-वोटिंग के दिन कहीं देर न हो जाए इसलिए एक दिन पहले परिचित के घर चले जाते हैं।

    मलैदा के 35 वर्षीय शाेभित उइके के मुताबिक उन्हें वोट डालने के लिए परिवार समेत पोलिंग वाले गांव जाना होता है।

    मलैदा के ही 26 साल के दिलेश उइके के मुताबिक वह पिछली बार भी वोट करने गया था, उसके पास बाइक है, इसमें कुछ लोगों को बैठाकर पहले गातापार फिर करेलागढ़ तक पहुंचता है।

     

     

  3. एक नजर इनकी तकलीफों पर, हम हर बार क्यों भूल जाते हैं इन्हें

    कटेमा में एक मात्र बोर है, जिससे पूरा गांव पानी पीता है। अगर ये बोर कभी बंद हो जाए तो सुधारने महीनों कोई नहीं आता।

    कटेमा गांव में कोई मेडिकल इमरजेंसी हो तो गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंचती। खुद इन्हें अपने साधन से गातापार तक आना होता है।

    मलैदा में आंगनबाड़ी केंद्र तो है, लेकिन वह किराए के कच्चे मकान में चल रहा है। गांव के बच्चों को प्राइमरी की पढ़ाई के बाद मध्यप्रदेश के स्कूलों में दाखिला लेना पड़ता है।

  4. पिछले चुनाव से ज्यादा इंतजाम रहेंगे

    मतदाताओं के लिए सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए गए हैं। पोलिंग बूथों में भी बीते चुनाव की तुलना में अतिरिक्त जवान तैनात रहेंगे। इसके अलावा गांव में भी सर्चिंग जारी है। -कमललोचन कश्यप, एसपी

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