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चुनाव विश्लेषण / कांग्रेस और भाजपा में अब फर्क कहां? सरकार पर ‘लदने’ की राजनीति

  • भाजपा में सत्ता के वो सभी रोग आए जो कभी कांग्रेस में होते थे
  •  असंतोष के स्वर भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं

देश में 15 वर्षों से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी में विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा होते ही असंतोष के उठते स्वर चाल-चरित्र-चेहरे वाली पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। शायद इसका मूल कारण 15 वर्षों में चाल, चरित्र, चेहरा बदल जाना है। आज भाजपा में सब-कुछ कांग्रेस जैसा ही है और कहीं-कहीं संगठित रूप में भी दिखाई देता है, जबकि कांग्रेस में यही काम बिखरा हुआ दिखाई देता रहा है। जनप्रतिनिधि बनने पार्टी टिकट के लिए मारामारी के मूल में पार्टियों की कमजोरी तथा सरकार पर ‘लदने’ की उसकी प्रवृत्ति मूल-कारक है।

 

देश की राजनीति में कांग्रेस हो या भाजपा अथवा अन्य पार्टियां आज तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाई हैं। ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज हो करदाताओं के पैसे तथा प्राकृतिक संसाधनों की बदौलत अपनी पार्टी तथा अपना घर भरना ही आज की राजनीति हो गई है। शायद इसीलिए राजनीति से जुड़ने वाला हर व्यक्ति चाहता है कि सत्ता की नकेल कम से कम कुछ दिनों के लिए उसके हाथों में आ जाए ताकि उसके माध्यम से वह आगे की राह सुनिश्चित कर ले। देश में राजनीति की शुरुआत कांग्रेस के उद्भव से मानें तो आजादी मिलने के बाद उसमें भी व्यापक परिवर्तन आए हैं। आजादी के आंदोलन में शरीक सेनानियों ने जनता की खुशहाली को लक्ष्य बनाकर आगे की राजनीति शुरू की किन्तु धीर-धीरे उसमें अपने-आपको खुशहाल बनाने वालों की संख्या बढ़ती गई। नतीजा यह हुआ कि जनता उनसे दूर होती गई तथा क्षेत्रीय दल और धर्म-भेद की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी मजबूत होकर सामने आई।

छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय दल कभी प्रभावी भूमिका में नहीं रहे। समाजवादियों के विलोप होने के बाद भारतीय जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के मुकाबले में खड़ी रही किंतु 15 वर्षों में आज उसमें सत्ता के वे सभी रोग आ गए हैं, जो कभी कांग्रेस पार्टी में हुआ करती थी। पार्टी और विधानसभा में राजनीति के माध्यम से पूंजी बनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। आम चुनाव को छोड़ दें तो शेष चार वर्ष ग्यारह माह वे भाग्य विधाता की मुद्रा में रहते हैं। मतदाताओं को उनके भाग्य निर्धारण के लिए पांच साल में केवल एक माह मिलता है किंतु राजनीतिक जागरूकता की कमी से यह अवसर भी वे अक्सर खो देते हैं तथा शेष समय कभी अपने आपको और कभी निर्वाचित विधायक को कोसने में बिता देते हैं।

यही हाल राजनीतिक दलों के भीतर भी है। दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन का घोर अभाव है। एक बार किसी के हाथ में पॉवर आ जाए वह अपने अापको दूसरे ग्रह का प्राणी समझने लगता है। जब आम चुनाव आता है तो प्रत्याशी चयन के लिए तरह-तरह के व्यायाम किए जाते हैं। पार्टी जनित सर्वे, निष्ठावान कार्यकर्ताओं के माध्यम से सर्वे, पैसा देकर विशेषज्ञों के माध्यम से सर्वे, केंद्र और राज्य सरकार की गुप्तचर एजेंसियों की रिपोर्ट और उसके बाद एक से अधिक कमेटियों की बैठक तब कहीं जाकर प्रत्याशी का चयन हो पाता है। इतने अधिक व्यायाम के बाद घोषित प्रत्याशी के बारे में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं में एक राय बनाने में पार्टियां क्यों असमर्थ हैं? इस सवाल को पार्टियों को सुलझाना होगा अन्यथा स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के दलबदल को कानून बनाकर रोकने के मामले में एक राय होने वाली पार्टियां आज चुनाव पूर्व दलबदल की “मंडी’ लगाकर क्यों बैठी हैं? दलबदल करवाने से तात्कालिक लाभ मिल सकता है लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से कोई नहीं बचा सकता। दल बदल कर आने वाला कब तक अापके साथ रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। दूसरी ओर लंबे समय से आपके साथ निष्ठाबद्ध रहने वाले कार्यकर्ता व नेता कहेंगे, हम क्या इसी दिन के लिए एक खूंटे से बंधे रहे।

लोकतंत्र को कमजोर करने वाला यह खेल छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में खतरनाक साबित हो सकता है। गोवा और उत्तर पूर्व के राज्यों में दो-चार विधायकों के इधर-उधर होने से सरकारें बार-बार बदलती रहती हैं और अस्थिर सरकार का खामियाजा राज्य की जनता को भोगना पड़ रहा है। अतएव प्रदेश की भलाई मजबूत सरकार और मजबूत पार्टियों में भी निहित है, लेकिन दो प्रमुख पार्टियों का आचरण एक हो तो “जागते रहो!’ की भूमिका के लिए कुछ और दलों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।

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