राजस्थान में कांग्रेस आलाकमान ने सिर फुटौअल रोकने के लिए मंत्रिमंडल फेरबदल करके अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमे में संतुलन बनाने का प्रयास किया। विरोधी खेमे की मांग के बावजूद सीएम नही बदला गया लेकिन पायलट के लोगों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई जिससे उनका भी राजनीतिक महत्व बना रहे। अब सबकी निगाह छत्तीसगढ़ पर है जहां यूपी चुनाव के बाद एक बार फिर सियासत गरमा सकती है।

माना जा रहा है कि राजस्थान का फार्मूला छत्तीसगढ़ में भी काम आ सकता है। यानी मंत्रिमंडल फेरबदल करके भूपेश बघेल और टी एस सिंहदेव खेमे में एक संतुलन बनाया जाए।  हालांकि देव मुख्यमंत्री से कम की बात पर राजी नही हैं। उनका दावा है कि राहुल गांधी ने ढाई ढाई साल के मुख्यमंत्री का फार्मूला छत्तीसगढ़ के लिए तय किया था। जबकि सच्चाई यह है कि ज्यादातर लोग इस फार्मूले से अनजान रहे। इस तरह के फार्मूले पर न तो वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की गई थी और न ही भूपेश बघेल को ही इस बारे में बताया गया था। लिहाजा अब उस कथित वादे पर अमल आसान नही है।

सियासी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी एक बार फिर जब छत्तीसगढ़ का मामला निपटाने के लिए यूपी चुनाव के बाद बैठेंगे तो ये तय माना जा रहा है कि सबसे मुफीद फार्मूला राजस्थान जैसा ही होगा। क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लगने लगा है कि आंतरिक दबाव में मुख्यमंत्री बदलने का फैसला अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाएगा। जानकार ये भी मानते हैं कि राजनीतिक लिहाज से प्रचंड बहुमत की सरकार में मुखिया को बदलने की जरूरत शायद ही कभी महसूस हुई हो। वह भी तब जबकि ज्यादातर विधायकों का समर्थन भी मौजूदा मुख्यमंत्री के साथ है। माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी इस बात के पक्ष में कतई नही हैं कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री बदला जाए।  

दावा है कि छत्तीसगढ़ में बघेल के पक्ष में विधायकों का समर्थन है साथ मे उनका जातीय आधार भी पार्टी को प्रदेश और प्रदेश से बाहर ताकत प्रदान करता है। बघेल कुर्मी जाति से आते हैं। पिछड़ा वर्ग में कुर्मी काफी प्रभाव रखते हैं। खासतौर पर उत्तरप्रदेश में कुर्मियों की सियासी ताकत के बूते ही अपना दल को भाजपा ने काफी महत्व दिया है। यूपी में बघेल को वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाकर कांग्रेस पार्टी ने भी यही संदेश दिया है। सियासी विश्लेषकों का कहना है कि एक बात और जो बघेल के पक्ष में है वह ये है कि उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ का गवर्नेंस एक मॉडल के तौर पर उभर रहा है। राज्य की योजनाएं केंद्रीय स्तर पर चर्चा में आई हैं। खुद प्रियंका गांधी ने इन योजनाओं का बखान किया है।  ऐसे में मुख्यमंत्री बदलने का सीधा फायदा भाजपा को होगा। साथ ही छत्तीसगढ़ मॉडल को भाजपा फेल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत करेगी। जानकारों के मुताबिक बघेल के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर टी एस देव कई मामलों में पिछड़ जाते है। सियासी और संगठन के स्तर पर वे बघेल की तरह पैठ नही बना पाए हैं। मंत्री के तौर पर भी वे अपनी खास छाप छोड़ने में असफल रहे।  तर्क दिया जाता है कि कोविड के दौर में जब लोगों को मदद की जरूरत थी उनका दिल्ली में जमे रहना उनके खिलाफ गया। आदिवासी मुद्दे पर देव ने अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर मुख्यमंत्री को घेरने का प्रयास किया लेकिन अपने ही इलाके में पंडो आदिवासियों की मौत के मसले पर उनकी चुप्पी उनके लिए उल्टा पड़ गई। बताया जा रहा है कि दोनो पक्ष की बातें आलाकमान तक पहुंची हैं और इसकी पुष्टि के बाद ही बघेल को सीएम बनाये रखने के पक्ष में प्रियंका गांधी मजबूती से सामने आईं। हालांकि राहुल गांधी के कुछ करीबी रणनीतिकार देव के पक्ष में बैटिंग कर रहे थे लेकिन प्रियंका के आगे आने के बाद उन्होंने खुद को पीछे कर लिया।