भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन से मां लक्ष्मी को समर्पित महालक्ष्मी व्रत आरंभ होता है। यह व्रत भाद्रपक्ष की अष्टमी से आरंभ होकर सोलह दिनों तक रहता है और आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत संपन्न होता है। महालक्ष्मी व्रत के दिन ही राधा अष्टमी और दूर्वा अष्टमी भी होती है। इसलिए इस व्रत का महत्व और बढ़ जाता है। इस व्रत को उन लोगों को अवश्य करना चाहिए जिनके घर में धन का अभाव रहता है।

पौराणिक कथा के अनुसार जब पांडव कौरवों से सब कुछ हार गए तो युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर यह व्रत रखा। इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है। धन, समृद्धि प्राप्त करने के लिए मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए ये व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत में मां लक्ष्मी के धन लक्ष्मी स्वरूप और संतान लक्ष्मी स्वरूप की पूजा की जाती है। इस व्रत में पूजा स्थल पर हल्दी से कमल बनाएं। उस पर मां लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। पूजा में श्रीयंत्र अवश्य रखें। व्रत के अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का उद्यापन करें। माना जाता है कि इस व्रत को करने से जीवन में कभी आर्थिक दिक्कत नहीं आती हैं। मां लक्ष्मी की पूजा में पूरे परिवार को शामिल होना चाहिए। पति-पत्नी को पूजा साथ मिलकर करनी चाहिए। इससे देवी मां प्रसन्न होती हैं। मां लक्ष्मी की पूजा के साथ भगवान श्री हरि विष्णु जी की भी उपासना करें। इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है। महालक्ष्मी व्रत से सुख, ऐश्वर्य और धन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 16वें दिन महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन किया जाता है। मान्यता है कि जिस घर में इस व्रत को किया जाता है वहां पारिवारिक शांति बनी रहती है।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।