भगवान महावीर की शिक्षाओं में अहिंसा का मर्म बहुत गहरा है। अहिंसा के एक शब्द में धर्म की पूरी परिभाषा है। इसीलिए अगर अहिंसा को सामान्य प्रचलित अर्थ में लेंगे, तो भगवान महावीर के संदेश को समझना कदाचित संभव ही ना हो। ओशो कहते हैं कि भगवान महावीर द्वारा बताई गई अंहिसा के अर्थ का आधार दूसरे में है ही नहीं।

हावीर कहते हैं- धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। जीवन में जो भी आनंद की संभावना है, वह धर्म के द्वार से ही प्रवेश करती है। जीवन में जो भी स्वतंत्रता उपलब्ध होती है, वह धर्म के आकाश में ही उपलब्ध होती है। और जीवन में जो भी दुख है, वह किसी न किसी रूप में धर्म से च्युत हो जाने में, या अधर्म में संलग्न हो जाने में है। महावीर की दृष्टि में धर्म का अर्थ है- जो मैं हूं, उस होने में ही जीना, उससे जरा भी, इंच-भर भी च्युत न होना।

जो मेरा होना है, जो मेरा अस्तित्व है, उससे जहां मैं बाहर जाता हूं, सीमा का उल्लंघन करता हूं; जहां मैं विजातीय से सम्बंधित होता हूं; जहां मैं उससे संबंधित होता हूं, जो मैं नहीं हूं; वहीं दुख का प्रारम्भ हो जाता है। और दुख का प्रारम्भ इसलिए हो जाता है कि जो मैं नहीं हूं, उसे मैं कितना ही चाहूं, वह मेरा नहीं हो सकता। सत्य केवल एक है, और वह यह कि मैं स्वयं के अतिरिक्त इस जगत में और कुछ भी नहीं पा सकता हूं। अधर्म का अर्थ है, स्वयं को छोड़कर, और कुछ भी पाने का प्रयास। हमारी दृष्टि सदा दूसरे पर लगी है।

महावीर कहते हैं, धर्म मंगल है। कौन-सा धर्म? यह अहिंसा, संयम और तप वाला धर्म मंगल है। कोई कारण नहीं दिया जा रहा है, कोई प्रमाण नहीं दिया जा रहा है।अनुभूति के लिए कोई प्रमाण नहीं होता, सिद्धांतों के लिए प्रमाण होते हैं। अनुभूति स्वयं ही अपना तर्क है। महावीर जैसे लोग प्रमाण नहीं देते, सिर्फ वक्तव्य देते है। वे कहते हैं- ऐसा है। महावीर कहते हैं कि धर्म- अहिंसा, संयम, तप- इनका जोड़ है। तो एक अर्थ है- धर्म स्वभाव है। दूसरा अर्थ है- धर्म विधि है, स्वभाव तक पहुंचने की। तो धर्म के दो रूप हैं- धर्म का जो आत्यंतिक रूप है, वह है स्वभाव, स्वधर्म। और धर्म तक, इस स्वभाव तक- क्योंकि हम इस स्वभाव से भटक गए हैं, वरना कहने की कोई जरूरत न थी। स्वस्थ व्यक्ति तो नहीं पूछता चिकित्सक से कि मैं स्वस्थ हूं या नहीं। यदि स्वस्थ व्यक्ति भी पूछता है कि मैं स्वस्थ हूं या नहीं, तो वह बीमार हो चुका है।

तो धर्म का आखिरी सूत्र तो यही है, परम सूत्र तो यही है- स्वभाव। लेकिन वह स्वभाव तो चूक गया है। वह तो हमने खो दिया है। तो हमारे लिए धर्म का दूसरा अर्थ महावीर कहते हैं- जो प्रयोगात्मक है, प्रक्रिया का है, साधन का है। पहली परिभाषा साध्य की, अंत की, दूसरी परिभाषा साधन की। महावीर कहते हैं-‘अहिंसा, संजमो, तवो’। इतना छोटा सूत्र शायद ही जगत में किसी और ने कहा हो जिसमें सारा धर्म आ जाए। अहिंसा, संयम, तप- इन तीन की पहले हम व्यवस्था समझ लें, फिर तीन के भीतर हमें प्रवेश करना पड़ेगा।

    अहिंसा आत्मा है महावीर की दृष्टि से। अगर महावीर से हम पूछें कि एक ही शब्द में कह दें कि धर्म क्या है? तो वे कहेंगे- अहिंसा।   किंतु  सामान्य व्यक्ति उससे मतलब समझता है- दूसरे को दुख मत दो। महावीर का यह अर्थ नहीं है, क्योंकि धर्म की परिभाषा में दूसरा आए, यह महावीर बर्दाश्त न करेंगे। इसे समझते हैं। धर्म की परिभाषा स्वभाव है, और धर्म की परिभाषा दूसरे से करनी पड़े कि दूसरे को दुख मत दो, यही धर्म है। तो, यह धर्म भी दूसरे पर ही निर्भर और केंद्रित हो गया। महावीर यह भी न कहेंगे कि दूसरे को सुख दो, यही धर्म है। क्योंकि फिर वह दूसरा तो खड़ा ही रहा। महावीर कहते हैं- धर्म तो वहां है, जहां दूसरा है ही नहीं। दूसरे को दुख मत दो- यह महावीर की परिभाषा इसलिए भी नहीं हो सकती, क्योंकि महावीर मानते नहीं कि तुम दूसरे को दुख दे सकते हो, जब तक दूसरा लेना न चाहे। जितने दुख आपको मिल रहे हैं, उसमें से निन्यानबे प्रतिशत आपके आविष्कार हैं।

तो महावीर की अहिंसा का यह अर्थ नहीं है कि दूसरे को दुख मत देना, क्योंकि महावीर तो कहते ही यह हैं कि दूसरे को न कोई दुख दे सकता है और न कोई सुख दे सकता है।  महावीर का अहिंसा का अर्थ है कि मैं ऐसा हो जाऊं, जैसे मैं हूं ही नहीं। महावीर का अहिंसा का जो गहनतम अर्थ है, वह है अनुपस्थिति, जैसे मैं नहीं हूं। हम सबकी चेष्टा है कि हमारी उपस्थिति अनुभव हो, दूसरा जाने कि मैं हूं, मौजूद हूं। उपस्थिति अनुभव करवाने की कोशिश का नाम हिंसा है। और जब भी हम किसी को कोशिश करवाते हैं, अनुभव करवाने की कि मैं हूं, तभी हिंसा होती है।

अहिंसा इसके विपरीत है। दूसरा उपस्थित हो और इतनी तरह उपस्थित हो कि मेरी उपस्थिति से उसकी उपस्थिति में कोई बाधा न पड़े। मैं ऐसे गुजर जाऊं भीड़ से कि किसी को पता भी न चले कि मैं था। इसे हम ऐसा कह सकते हैं और महावीर ने ऐसा कहा है – अहंकार हिंसा है और निरहंकारिता अहिंसा है। मतलब वही है कि वह दूसरे को अपनी उपस्थिति प्रतीत करवाने की जो चेष्टा है।
अहिंसा का अर्थ है गहनतम अनुपस्थिति। बुद्ध का जो तथाता का भाव है, वही महावीर की अहिंसा का भाव है। तथाता का अर्थ है- जैसा है, स्वीकार है। अहिंसा का भी यही अर्थ है कि हम परिवर्तन के लिए जरा भी चेष्टा न करेंगे। जो हो रहा है, ठीक है। जो हो जाए ठीक है। जीवन रहे तो ठीक है, मृत्यु आ जाए तो ठीक है।  महावीर कहते हैं- करना ही हिंसा है, कर्म ही हिंसा है। अकर्म अहिंसा है।