खरसिया। यूं तो 108 की लापरवाहियां अक्सर सुनने को मिलती थीं, परंतु आज नजरों के सामने ऐसा मंजर देखा गया कि दिल दहल गया। दूसरे शब्दों में कहें तो 108 प्रबंधन की लापरवाही ने परिवार के एकमात्र सहारा युवा दिलीप अग्रवाल की जान ले ली।

दाल एवं मसाला पिसाई कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाले 80 वर्षीय माता-पिता का सहारा 50 वर्षीय दिलीप अग्रवाल की तबीयत यूं तो बिल्कुल ठीक थी, परंतु रविवार की रात अचानक बेचैनी सी होने लगी। वहीं वह बेसुध होकर बिस्तर पर पड़ा रहा। ऐसे में उनकी पत्नी ने पड़ोस के परिवार से सहायता मांगी। पड़ोस में रहने वाली आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की कर्मचारी याचिका शर्मा ने तत्काल 108 पर कॉल किया। परंतु याशिका सहित अन्य दो लोगों के कॉल करने पर भी 3 घंटे विलंब तक 108 वाहन नहीं पहुंचा। हालांकि इस दौरान 108 से 3 बार एड्रेस कंफर्म करने के लिए कॉल जरूर आया। उल्लेखनीय होगा कि स्थानीय 108 चालक यह जरूर जानते होंगे कि सिविल अस्पताल और स्टेशन चौक स्थित श्याम मंदिर की दूरी महज 300 मीटर से अधिक नहीं है और सीधा रास्ता है। बावजूद ना आने के इस बहाने ने एक हंसते खेलते परिवार को बेसहारा कर दिया।

लगभग ढाई घंटे इंतजार के बाद दुखी परिवार ने निजी वाहन की व्यवस्था की। वहीं जिंदल पहुंचने तक दिलीप की तबीयत और अधिक बिगड़ने लगी। ऐसे में उसे जिंदल से रायगढ़ रेफर किया गया। दुर्भाग्य रहा कि रायगढ़ पहुंचने से पूर्व दिलीप की सांसें थम चुकी थीं।

दिलीप ने स्थापित किया था आदर्श

मिलनसार एवं जिंदादिल दिलीप अग्रवाल ने एक मध्यमवर्गीय परिवार से होकर भी अपने जीवन काल में एक आदर्श स्थापित किया था। बताना लाजिमी होगा कि दिलीप ने रायगढ़ अनाथालय से अनाथ माने जाने वाली बेटी को जीवनसंगिनी बना कर एक परिवार दिया था। वहीं 108 की लापरवाही से कहें या फिर होनी कहें कि इस हंसते खेलते परिवार में दिलीप की एक 11 वर्षीय पुत्री भी अब पिता विहीन हो गई।

रोते-रोते सूख गईं बूढ़े माँ-बाप की आंखें

80 वर्षीय बूढ़े पिता जो करीब-करीब दवाइयों पर ही अपना जीवन जी रहे हैं, उनके बुढ़ापे की लाठी यूं टूट जाने से उनकी दुनिया वीरान हो गई। वहीं माँ की आंखें अपने जीवन का सहारा और युवा पुत्र दिलीप के विरह में रोते-रोते थक गई हैं। ऐसे में इन शिथिल आंखों को एक छोटी सी मुस्कान देने के लिए शासन और प्रशासन को संबल बन कर जरूर साथ देना चाहिए।

(KBB)